Entrepreneur Diary

यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं

स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं

क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही
वरदान माँगूँगा नहीं

लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं

चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं

  • श्री शिव मंगल सिंह सुमन

The night that stayed

Long back ago on a starry night,

I met a thief, 

He had an attitude

And yes lot of stories

Interesting ones,

funny ones,

But then as it turned out

all were fake

while i was mentoring him, 

he was stealing on my name

And now he is offended,

As not believing something which was once believed 

Is also a violation of faith

Change of pattern

And thief feels betrayed that no longer I hear his stories

and the night is refusing to end

Oh I met a thief and he got an attitude

The Entrepreneur

मैंने उसको जब-जब देखा
लोहा देखा
लोहे जैसा तपते देखा
गलते देखा
ढलते देखा
मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा

~ केदारनाथ अग्रवाल

वर्गभेद और मानव समता

जहाँ वर्ग भेद की ज्वाला है,

जहाँ मानव भेद की हाला है,

जहाँ अपराध भी बाटा जाता है A, B, C के भागो में,

जहाँ मानव भी आँका जाता है, वेतन के प्रतिमानो में,

क्या वहाँ भी मानव समता का उजाला है ।

written in 1984, discovered in an old diary

धर्म ऐवम कर्म

धर्म

“जो धारण किया जय, वो धर्म होता है। एक कर्म प्रधान व्यक्ति के लिए, कर्म ही उसका धर्म होता है अंतह कर्म ही धर्म है |”

Sometimes

Sometimes five minutes take a year to fill,
sometimes a year passes by in five minutes,
Some time it happens this way, sometimes another way around!
but life goes on,
dreams go on …
I crack a bit in bytes sometimes
and then again gather me
and move on
Sometimes I fight back
only to realize the lost cause
and when I retreat,
I again believe the cause
the causes and faith, represent one or another
the interest of individual or group,
sometimes individuals win,
sometimes it is a group
but whose win was more important
or was it just a matter of time,
it becomes difficult to say sometimes
and life goes on ..
sometimes it takes ..

written in 1998 at IIML

We All are Hitler, We All are Buddha

We all are Hitler, we all are Buddha,
It is not they are some other,
It is just we, who vacillate between one and the other,
Is it a moral choice to choose one,
Or just inability to choose one?
B’coz somewhere deep down there,
We are still the one, with mistaken identities –
We are all Buddha, we are all Hitler.

                                                   ~ Written in 1999 at Mumbai 

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ! – The Startup Anthem

वृक्ष हों भले खड़े, हों घने, हों बड़े

एक पत्र छाँह भी,

मांग मत! मांग मत! मांग मत!

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

तू न थकेगा कभी!

तू न थमेगा कभी!

तू न मुड़ेगा कभी!

कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

यह महान दृश्य है

चल रहा मनुष्य है

अश्रु-स्वेद-रक्त से

लथ-पथ! लथ-पथ! लथ-पथ!

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

(Poem by Harivansh Rai Bachchan from “Madushala”)